संस्करण: 04अगस्त-2008

क्या सख्त कानूनों की कमी है ?

 

सुभाष गाताड़े

क्या मुल्क में होनेवाली आतंकी घटनाओं को रोक पाना इस वजह से सम्भव नहीं हो पा रहा है कि ऐसे सख्त कानूनों की कमी है जो इसे काबू में कर सके ? यह प्रश्न एक के बाद एक सामने आयी कुछ घटनाओं से नए सिरे से विचारणीय हो उठा है। एक तरफ जहां प्रमुख विपक्षी पार्टी की तरफ से इस मांग को बुलन्द किया जा रहा है, वहीं यह भी देखने में आ रहा है कि मध्य वर्ग के एक हिस्से में भी इस किस्म का सहजबोधा /कामनसेन्स व्याप्त है।

दिक्कत इस बात की है कि सियासी तिरंदाजी के आलम में लोकरंजक लगनेवाले इस सुझाव पर सार्थक बात नहीं हो रही है। कांग्रेस पार्टी जिसे यह श्रेय जाता है कि उसने आज़ाद हिन्दोस्तां में सख्त कानूनों की नींव डाली - ऐसे कानून जिनके तहत आम नागरिक को प्रदत्ता बुनियादी अधिकार एक तरह से स्थगित किए जाते हैं - वह जहां फेडरल एजेन्सी का राग आलाप रही है, वहीं प्रमुख विपक्षी भाजपा उसके शासनकाल में बने 'पोटा' (प्रीवेन्शन आफ टेररिजम एक्ट) जैसे कानून की वापसी चाह रही है। न उन तथ्यों को पेश किया जा रहा है जो बताते हों कि ऐसे कानून वाकई कितने उपयोगी होते हैं, न ऐसे तथ्य बताए जा रहे हैं जो सख्त कानूनों की धारणा को ही सिर के बल खड़े कर देते हों।

अगर एक-एक करके इन मसलों को लिया जाए और फिलवक्त 'पोटा' की उपयुक्तता पर बात केन्द्रित की जाए तो यही बात दिखाई देती है कि पोटो या पोटा के होने से भाजपा की अगुआईवाले केन्द्रीय शासन के दिनों में आतंकवादी घटनाएं कहीं से रूकी नहीं थीं। आजाद हिन्दोस्तां के इतिहास के सबसे बड़ी आतंकी घटना में शुमार संसद पर आतंकवादी हमला जैसी घटना जब हुई थी,तब पोटो का अस्तित्व पहले से था। चाहे लाल किले पर आतंकी हमला हो या अहमदाबाद में अक्षरधाम मन्दिर पर हमला हो या जम्मू के चर्चित मन्दिर पर हुआ आतंकवादी हमला हो, तमाम सारी बड़ी घटनाएं उन दिनों में हुई थीं।

वैसे इस बात की बहुत कम चर्चा होती है कि अकेले पोटा के खतम कर देने के बाद भी सरकार के पास विशेष कानूनों की कोई कमी नहीं हैं। फिर चाहे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (1980) हो ; गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण्) अधिनियम, 1967 हो ; विघटनकारी क्षेत्रा अधिनियम, 1990 हों या उत्तार-पूर्व या कश्मीर में लागू सशस्त्रा सेना विशेष बल अधिनियम 1958 हो, ऐसे कई कानून हैं। इसके अलावा विभिन्न राज्य सरकारों ने अपने यहां ऐसे सख्त कानूनों का निर्माण किया हैं। फिर चाहे महाराष्ट्र का 'मकोका' (संगठित अपराधा नियंत्राण अधिनियम) हो या यूपी गैंगस्टर एक्ट हो, आदि कई कानून हैं।

यहां तक कि जनाक्रोश के चलते जब कांग्रेस की अगुआईवाली संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धान सरकार ने 21 सितम्बर 2004 को अपनी पूर्ववर्ती भाजपा सरकार द्वारा बनाए सख्त कानून 'पोटा' (प्रीवेन्शन आफ टेररिजम एक्ट) को खारिज करवाने के लिए अध्या जारी किया, उसी साथ उसने एक दूसरे अध्यादेश के जरिए 'गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण)1967 को संशोधित करते हुए पोटा के कई विवादास्पद, जनविरोधी प्रावधान उसमें शामिल कर उसे जारी किया। अगर बारीकी से पड़ताल करें तो प्रस्तुत संशोधित अधिनियम की कई धाराएं पोटा से भी अधिक खतरनाक मालूम पड़ती हैं। 2004 के संसद के शीतकालीन अधिवेशन में इस पर संसद की मुहर भी लगा दी गयी।

मालूम हो कि जहां संशोधित अधिनियम में जमानत और व्यक्तिगत अधिकारों पर चोट करते पोटा के कुछ प्रावधान हटा दिए गए, वहीं आतंकवादी गतिविधियों की परिभाषा, आतंकवादी संगठनों पर पाबन्दी लगाने और इलैक्ट्रानिक सम्प्रेषण को बाधित करने या उसे अवरूध्द करने जैसे पोटा के प्रावधान बरकरार रखे गए। जहां पोटा की समय-समय पर समीक्षा करने की जरूरत अधिनियम बनाते वक्त रखी गयी थी, वहीं गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण्) अधिनियम 1967 के संशोधित रूप में इस समीक्षा की आवश्यकता को खारिज किया गया। इस मामले में यह पोटा से भी खतरनाक प्रावधान था जो अस्थायी और असामान्य कदमों को सामान्य कानूनी प्रणाली का हिस्सा बनाने की बात करता था। इतना ही नहीं पोटा के तहत दायर मुकदमे में अभियुक्त के पास अपनी केस को लेकर समीक्षा कमेटी के पास जाने का प्रावधान रखा गया था, उसे भी इसमें से हटा दिया गया। 'आतंकवादी गिरोह' और 'आतंकवादी संगठन' की परिभाषा में, विदेशी मुल्कों में आतंकवादी घटनाओं के बारे में तथा इलैक्ट्रानिक सम्प्रेषण को बाधित करने के मामले में यह नया अधिनियम पोटा से भी अधिक जनविरोधी है। पोटा के तहत कमसे कम गनीमत थी कि अनुसूचि में दर्ज 'आतंकी संगठनों' पर सरकार कार्रवाई कर सकती थी, वहीं संशोधित अधिनियम में ऐसी कोई बाधयता नहीं थी।

यह कहना भी तथ्य से परे है कि आतंकवादी घटनाओं में मुकदमा चलाने के लिए ऐसे विशेष कानून की जरूरत होती है। इस सन्दर्भ में यह नोट किया जाना जरूरी है कि चाहे गांधीजी की हत्या जैसी आतंकी कार्रवाई हो या हमारे दौर की दो प्रमुख आतंकी घटनाओं का मसला हो- फिर वह चाहे राजीव गांधी की हत्या का मामला हो या लाल किले पर हमले का प्रसंग हो - भारतीय दण्ड विधान की धारा के तहत ही अभियुक्तों को सज़ा हुई, मुज़रिमों को दण्डित करने के लिए किसी सख्त कानून की जरूरत नहीं पड़ी।

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए ऐसे सख्त कानून आतंकवादी घटनाओं को रोकना दूर रहा उल्टे पुलिस एवम सुरक्षाबलों को आम लोगों को प्रताडित करने का एक अन्य उपकरण प्रदान करते हैं। गृह मंत्रालय की वर्ष 1995 की रपट के हिसाब से दस साल की इस अवधि में जबकि टाडा प्रभावी रहा तो देश के पैमाने पर 76616 गिरफ्तारियां हुई थीं जिनमें से अकेले गुजरात से 18584 लोग पकड़े गये थे। इन 76 हजार से अधिक लोगों में से पचीस प्रतिशत को बिना सबूत के अभाव में छोड़ देना पड़ा और जिन पर मुकदमा चला उनमें से महज चार प्रतिशत पर आरोप साबित किये जा सके अर्थात बाकी 96 प्रतिशत लोग इस कानून के खतरनाक प्रावधानों के बावजूद निर्दोष साबित हो सके। प्रश्न उठता है कि 1985 से 1995 के बीच जब वहां कांग्रेस हुकूमत पूर्ण बहुमत से राज कर रही थी, उस वक्त क्या सूबा गुजरात आतंकी अड्डा बना था। दरअसल इन दस सालों के दौरान सबसे ज्यादा गिरफ्तारियां गुजरात में होने का कारण यही था कि इसके तहत रिलायन्स फैक्टरी में आन्दोलनरत मजदूरों से लेकर विभिन्न सामाजिक कर्मी जेलों में ठूंसे गए थे।

विडम्बना इसी बात की है कि चूंकि सख्त कानूनों की आवश्यकता जनमानस के सहजबोधा का हिस्सा बना है, उसी वजह से इनकी 'कार्यक्षमता' को देखते हुए साधारण कानूनों में भी इनके प्रावधानों को शामिल करने की बात चलती रहती है। वर्ष 2000 में तत्कालीन एनडीए सरकार की सदारत में 'आपराधिक न्याय प्रणाली' को सुधारने के लिए जो मालीमाथ कमेटी बनी थी उसके जरिए हम यही कोशिश देख सकते हैं। आपराधिक न्याय प्रणाली को सुधारने का संकल्प लेते हुए बनी प्रस्तुत कमेटी ने साफ साफ प्रस्ताव रखा कि अगर आपराधिक घटनाओं में फैसले जल्द लेने हैं तो पुलिस अधिकारी के सामने की गयी अपराधास्वीकृति को भी अदालत में सबूत के तौर पर पेश करने की इजाजत दी जाए।

अगर आज़ाद हिन्दोस्तां की तवारीख के पन्ने पलटिए तो पता चलता है कि 1950 ईसवी में पहली दफा ऐसा कानून बना था 'प्रीवेन्टिव डिटेन्शन एक्ट' जो 'स्वतंत्र और जनतांत्रिक हुकूमत के आदर्शो' के खिलाफ था। बताया जाता है तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को इस कानून को बनाने के लिए कई 'निद्राविहीन रातों' से गुजरना पड़ा क्यो कि जो कानून बनने जा रहा था वह एक स्वाधीन, जनतांत्रिक मुल्क के बुनियादी सिध्दान्तों के खिलाफ था।

यह जुदा बात है कि अपने आप को सरदार पटेल के अनुगामिनी कहलानेवाले लोग ऐसे मामलों में किसी उज्र से गुजरते नहीं होंगे

सुभाष गाताड़े