संस्करण: 03अगस्त-2009

 

केंद्र सरकार का एक निर्णय-
बेटियों के हित में

 

  डॉ. गीता गुप्त

निस्सन्देह केंद्र सरकार का यह निर्णय प्रशंसनीय और उल्लेखनीय है कि भविष्य में शासकीय-अर्ध्दशासकीय सेवाओं सहित भारतीय प्रशासनिक सेवा हेतु आयोजित प्रतियोगिता परीक्षाओं में भाग लेने वाली महिलाओं से कोई परीक्षा शुल्क नहीं लिया जाएगा। इस आशय के निर्देश राज्य-सरकारों के लिए जारी कर दिये गये हैं। निश्चित रूप से यह ख़बर उन महत्वाकांक्षी युवतियों के लिए बहुत राहत पहुँचाने वाली है, जो मेघावी होने के बावजूद परिवार से आर्थिक सहयोग के अभाव में उच्च सेवा प्रतियोगिता-परीक्षाओं में भाग लेने से वंचित रह जाती थीं। हालांकि आज शिक्षा हेतु बैंकों में ऋण की व्यवस्था सहज सुलभ है परंतु बेटियों की शिक्षा या उज्ज्वल भविष्य के लिए पालकों द्वारा ऋण लिये जाने की परंपरा अभी सभ्य, समाज में भी पूर्णत: विकसित नहीं हो पायी है।

वैसे तो समाज में निरंतर परिवर्तन हो रहे हैं और लड़कियों की शिक्षा के लिए केंद्र व राज्य-सरकारें प्रयत्नशील हैं। शासन द्वारा संचालित 'गांव की बेटी' और 'प्रतिभा किरण' जैसी लाभकारी योजनाओं के कारण बेटियों की शिक्षा के प्रति पालकों का दृष्टिकोण उदार हुआ है। उनके रवैये में बदलाव आया है। लड़कियों को घर की चारदीवारी से निकलकर स्कूल पहुँचने के लिए साइकिल मुहैया कराने की योजना भी कारगर हुई है। कॉलेज में मिलने वाली छात्रवृत्ति ने भी माता-पिताओं को बेटियों की शिक्षा के प्रति आकृष्ट किया है। लेकिन इन सबके बावजूद शिक्षा के बाद लड़कियों की नौकरी के प्रति उनका दृष्टिकोण अभी उदार और सहज नहीं हो पाया है।

सामान्यत: लड़कियाँ स्कूल-कॉलेज की शिक्षा समाप्त होने के बाद गार्हस्थ जीवन में प्रवेश की प्रतीक्षा में ही समय बिताती हैं। वे किसी निजी शिक्षा संस्थान में अध्यापन अथवा कोई छोटी-मोटी नौकरी करती भी हैं, तो उनके लिए यह विवाह तय होने तक समय बिताने का माध्यम मात्र होता है। डॉक्टर या इंजीनियर बनने वाली लड़कियों को छोड़ दें तो, अधिकतर लड़कियों के पास शासकीय/अर्ध्दशासकीय सेवा में जाने के विकल्प खुले नहीं होते। उनके जीवन का लक्ष्य सुनिश्चित नहीं होता। इसके कई कारण हैं-एक तो, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए माता-पिता लड़कियों की कोचिंग पर लड़कों की तरह खर्च नहं करना चाहते। वे इस दिशा में सोचते तक नहीं। दूसरे, प्रतियोगिता-परीक्षाओं का शुल्क एवं अन्य व्यय-भार वहन नहीं करना चाहते। इसके पीछे एक अन्य कारण यह भी है कि लड़कियों की शिक्षा-दीक्षा और नौकरी पर जितना ख़र्च किया जाता है, उससे कहीं अधिक उनके विवाह पर खर्च करने की बाध्यता भी पालकों के क़दम रोकती है।

यह विडंबना ही है कि आज भी परिवार में लड़कों की परवरिश और शिक्षा पर भरपूर ध्यान दिया जाता है। यदि वे प्रतिभाशाली न हो, तब भी उनके रोजगार/ नौकरी या व्यवसाय के लिए माता-पिता अपनी ज़ायदाद बेचकर या ऋण लेकर भी उन्हें समाज में सुस्थापित करने का प्रयास करते हैं। परंतु लड़कियों के लिए ऐसा करने की बात वे सोच तक नहीं पाते। लड़कियां आज भी उनके लिए पराया धान या दूसरे की अमानत हैं, जिन्हें उनके विवाह तक संभालकर रखना मात्र ही वे अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। नि:संदेह बेटों के भविष्य की चिंता के पीछे माता-पिताओं का निजी स्वार्थ निहित हैं। वे उनसे अपने भविष्य की सुरक्षा की अपेक्षा करते हैं। चाहे उनकी अपेक्षा निराशा में ही क्यों न परिणत हो जाए ? बेटी को वे अपनी वृध्दावस्था का सहारा नहीं मानते। इस देश की सामाजिक परंपरा ही ऐसी रही है, जिसमें कहीं-कहीं तो माता-पिता विवाहिता पुत्री के घर का अन्न-जल ग्रहण करना भी पाप समझते हैं। ऐसी सामाजिक रूढ़ियों, परंपराओं और निरर्थक बंधानों को अभी और शिथिल होना है।

इस देश की आधी आबादी की दुर्दशा का सर्वप्रमुख कारण उनकी आर्थिक परतंत्रता है। इसी कारण वे घर-परिवार और समाज में स्वयं को कभी-कभी दीन-हीन समझती है। यह उनके आत्मविश्वास में कमी का कारण भी है। बहुत मुमकिन है कि सरकार द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं में लड़कियों को शुल्क की छूट दिये जाने से उनका हौसला बढ़ेगा और उनके प्रति माता-पिताओं के नज़रिये में बदलाव आएगा। वैसे भी भारतीय प्रशासनिक सेवा प्रतियोगिता के परिणामों ने सिध्द कर दिया है कि अवसर मिलने पर युवतियां अपनी प्रतिभा के बल पर आगे आकर शासन-तंत्र को चलाने में योगदान कर सकती हैं। सरकार द्वारा उनकी प्रतिभा को निखरने का अवसर दिये जाने के बाद उन्हें अपने को साबित करने का सुयोग सहज सुलभ होगा। परिणामत: पद, प्रतिष्ठा और आर्थिक समृध्दि के सोपानों को तय करने में सक्षम युवतियाँ एक नया इतिहास रचेंगी। केंद्र सरकार द्वारा आधी आबादी के हित में उठाया गया यह सकारात्मक क़दम मील का पत्थर साबित होगा, ऐसी आशा की जा सकती है।

डॉ. गीता गुप्त