संस्करण: 03अगस्त-2009

एक विवाद के प्रांत
 

मणिशंकर अय्यर (लेखक 2004-2009 तक केन्द्रीय मंत्री रहे हैं।)

हुल्लाबालू में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री गिलानी ने शर्म अल-शेख के मौके पर इसका जिक्र किया कि पाकिस्तान के पास बलूचिस्तान और अन्य क्षेत्रों में हमले (कौन और कहां से करेगा?) की कुछ सूचना थी। हमारे मुल्क मैं कुछ दिग्भ्रमित वर्ग है, जैसे भाजपा के राज्यसभा सदस्य अरुण शौरी 26/11 की घटना पर कहते हैं कि हम अपनी प्रत्येक आंख के बदले दुश्मन की दोनों आंखें ले लेंगे और अपने एक दांत के बदले दुश्मन का पूरा जबड़ा उखाड़ लेंगे। ऐसे वर्ग के लोगों का विश्वास है कि चूंकि पाकिस्तान सीमा पार से कश्मीर (व अन्य क्षेत्रों) में आतंकवाद फैला रहा है, हमें भी बलूचिस्तान मामले पर अपने मतभेद जोड़ने चाहिए। इससे ज्यादा नुकसानदायक और कुछ नहीं हो सकता कि कोई भारतीय बलूचिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश करे। पहली बात, बलूचिस्तान प्रांत (जहां केवल 1970 में याह्या शासन रहा) एक बलूच बहुल प्रांत नहीं है, जनसंख्या की दृष्टि से भी नहीं। बलूचिस्तान के चार जिलों में उत्तर-पश्चिम सीमावर्ती प्रांतों से लगे वजिरिस्तान और अफगानिस्तान, में पुश्तो-भाषी पठानों की बहुलता है। करीब 99 फीसदी गैर-बलूच भाषी जहोब में रहते हैं, वहीं 88 फीसदी ऐसे ही लोग लोरालई, पिशिन व क्वेटा बसे हैं, जबकि कराची से लगे लसबेला में सिंधी भाषी फैले हुए हैं। इसके अलावा बलूची से मकरानी बोली बहुत अलग है, जो दरअसल मकरम में एक विशेष भाषा है। जबकि ईरानी बलूचिस्तान से लगे चागई में जो बलूची बोली जाती है, वह बलूच बोली का ईरानी रूप है, जिसे बहुत कम ही दूसरे बलूच समझ पायेंगे।

 इसके अलावा बलूची से अधिक बराहुई भाषा बलूच हृदयस्थली में प्रचलित है। इसलिए यह बलूच भाषाई राष्ट्रीयता का प्रमुख दुश्मन है। परिभाषा के मुताबिक, पुश्तो और सिंधी भाषी अपनी सीमा से निर्वासित हैं, यद्यपि इनके बीच वे प्रांत की जनसंख्या में ज्यादा स्थापित हैं। सांस्कृतिक भिन्नता के पीछे भाषाई अंतर है, इसलिए बलूच राष्ट्रीयता को इसके समाधान की दिशा बहुत थोड़ा ही प्रभावी है। इस तथ्य को द ग्रैंड ओल्ड मैन आफ बलूच राष्ट्रीयता के प्रमुख वित्तीय सहयोगी अकबर मुस्तीखान ने, अपनी किताब -द बलूच एंड पाकिस्तान : जिन्हा टू जिया-में इसे सुंदर ढंग से लिखा है-''बलूच के संप्रदाय में ईश्वर और उनके चरित्र में शैतान कम है। वहीं पठान बिजेंजो खुद भी जब भूट्टो के समय में बहुत कम समय के लिए स्थापित जम्हूरियत के दौरान बलूचिस्तान के गवर्नर ने यह कहा था, '' पुश्तोभाषी क्षेत्रों में मौलवी का प्रतिनिधित्व सीमित है। हम बलूच पठानों से बहुत अलग हैं। मैं अब तक किसी बलूच पीर से नहीं मिला हूं। हमें धर्म को लेकर कभी कट्टर नहीं होना चाहिए।'' इन भाषाई और सांस्कृतिक विषमताओं को ब्रिटिश बलूचिस्तान और सहयोगी गठबंधानों के अंतर्गत छोड़े गए क्षेत्रों के बीच अलगाववादी इतिहास के माधयम से भड़काया जाता है। ब्रिटिश बलूचिस्तान (दो तहसीलें, नुशकी और नसिराबाद में छोड़कर) में बलूचिन नहीं, बल्कि पुश्तो बोली जाती थी। पाकिस्तान बलूचिस्तान अपने 27 प्रमुख आदिवासियों के बीच घातक झगड़े के द्वारा भड़काया गया भाषाई और सांस्कृतिक वर्णसंकर है। आर्थिक विषमताएं प्रांत की भाषाई-सांस्कृतिक विविधाता को बल देती है। चूंकि पुश्तो वर्चस्व वाले क्षेत्र में हरी-भरी, उपजाऊ घाटियां सम्मिलित हैं और जहां फलों की खेती मुख्य व्यवसाय है, इसलिए ज्यादातर सूखा क्षेत्र बलूचिस्तान में है, जहां 1,34,000 वर्ग मील भूमि मैं से सिर्फ तीन मिलियन एकड़ ही कृषि योग्य है। परिणामस्वरूप, जहां पुश्तोभाषी बलूचिस्तान व्यापक स्तर पर कृषि व्यवस्थित है, वहीं गैर-पुश्तोभाषीं बलूचिस्तान बड़े पैमाने पर खानाबदोश, भेड़, बकरी और ऊंट पालन पर आधारित चारावाही अर्थव्यवस्था है। आवश्यक तौर पर बलूची बलूचिस्तान में जनजातीय सामाजिक कार्यव्यवहार प्रचलित है, जबकि पुश्तो बलूचिस्तान में व्यापक तौर पर सामंती व्यवस्था प्रचलित है।

       इसके अतिरिक्त, बीसवीं सदी ने पुश्तोभाषी ब्रिटिश बलूचिस्तान को बोलन-चमन व क्वेटा-जाहिदन रेलमार्ग के साथ आगे ले आया, जिससे कोयला तथा सहयोगी उद्योगीकरण का लाभ मिला। वहीं बलूची बलूचिस्तान ज्यादातर ऐसे आधुनिक परिवर्तन से पूरी तरह से अछूता रहा, जबकि तटीय बलूचिस्तान बाहरी रूख अपना कर मछली उद्योग और विदेशी व्यापार के लिए बंदरगाहों का विकास किया। लैसबेला जो कराची से नदी के पार एक हब चौक का मैगनेट है, मैं निर्माण अर्थव्यवस्था की शुरूआतों को तेज किया गया है। इन विविधाताओं ने राजनीतिक उपद्रवियों को पैदा किया है, जो सबसे पहले 14 अगस्त 1947 से बलूच उपद्रवियों के बीच एकता स्थापित होने के किसी भी कोशिश किया जाता रहा है।

बलूचिस्तान को पाकिस्तान में शामिल करने के लिए जिन्ना ने काफी चतुराई से बलूचों को बलूचों के विरूध्द लड़वाने का खेल खेला। पहले, एक जनजातीय क्षेत्र में 55 जनजातीय सिरदारों में से 51 का मत पाकिस्तान के साथ विलय के पक्ष में लिया गया और जब कुछ महीनों बाद कलाट के खानों ने फूट का झंडा खड़ किया, मकरन और खारन के नवाबों के लिए समान स्थिति के मुताबिक उस विद्रोह की रीढ़ टूट गई और लासबेला के जाम साहेब, जिसने खुशी से अनुभवहीन पाकिस्तान के प्रति विनम्रता प्रकट कर दी। चागई जिले में सैनडक स्थित कॉपर और सल्फर के बड़े खानों और विश्व प्रसिध्द ओनिक्स खानों को चागई के सिरदारों को दिया गया। यह आंतरिक क्षेत्र के पश्तो सिरदार के लिए बिल्कुल अगल तरह का राजनीतिक उन्मुकता है। इसके बावजूद सुई गैस की खोज बुगती राजनीतिक को दे दिया गया। अत: पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ विगत आधी सदी के दौरान बलूच राष्ट्रवासियों का एक साहसिक उत्थान को प्रतिद्वंद्वी बलूच नेताओं ने खत्म कर दिया है और उन्हें एक सत्तासीन सरकार के विरूध्द संघर्ष के निर्णायक घड़ी में किनारा लगा दिया गया। बलूच शहीद जिन्होंने अपने सम्मान का नेतृत्व किया(नॉरोज खान जेहरी और शेर मोहम्मद- जनरल शेरॉफ, जैसा कि भुट्टो ने उन्हें उनके मास्को के पक्ष में दृष्टिकोण के कारण उपाधि दी थी)  जल्द उन्हें भूल गए, जितनी जल्द पाकिस्तानी सरकार ने उनके लिए अपने दरवाजे खोले।

 

 

मणिशंकर अय्यर (लेखक 2004-2009 तक केन्द्रीय मंत्री रहे हैं।)