संस्करण: 01सितम्बर-2008

घोषणाओं का पहाड़ खड़ा करने में जुटी

शिवराज सरकार

महेश बाग़ी

चुनावी साल में प्रदेश की भाजपा सरकार हर वह कोशिश करने में जुटी है, जिससे मतदाताओं को भ्रमित किया जा सके। अलग-अलग वर्गों की पंचायतें आयोजित करने के बाद इस बार इस सरकार ने निर्माण श्रमिकों के लिए पंचायत लगाई और लोक लुभावन घोषणाओं के ज़रिये इस वर्ग को लुभाने की कोशिश की। हालाँकि सरकार द्वारा की गई हरेक घोषणा स्वागत योग्य है, किंतु उनका कोई अर्थ इसलिए नहीं है, क्योंकि इन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति इस सरकार में नहीं है। इसलिए शिवराज सरकार को यह पंचायत भी दीगर पंचायतों से इतर नहीं है। इससे मजदूरों को हिस्से में निराशा ही आई है। इस आयोजन के नाम पर यह सरकारी खजाने को बर्बाद करती ही प्रतीत होती है।

 

निर्माण मजदूरों की पंचायत आयोजित करने के प्रति सरकार की गंभीरता का अहसास इसी तथ्य से हो जाता है कि इसके लिए प्रदेश के सभी जिला कलेक्टरों की भीड़ जुटाने के निर्देश दिए गए थे। सरकारी तंत्र का दुरूपयोग करते हुए सरकार ने परिवहन विभाग के माध्यम से 1100 बसों का इंतज़ाम किया, जिनमें मजदूरों को भरकर भोपाल लाया गया। इसके अलावा इस आयोजन के टेंट, मजदूरों के भोजन, माइक, प्रचार-प्रसार पर लगभग पांच करोड़ रुपये खर्च किए गए। यदि बस व्यय और इस राशि को जोड़ा जाए तो कुल राशि दस करोड़ से अधिक हो जाती है। इस राशि से अगर कोई निर्माण किया जाता तो प्रदेश के विकास में एक अध्याय जुड़ने के साथ सैकड़ों मज़दूरों को रोज़गार के अवसर भी मिल जाते। लेकिन इस सरकार का लक्ष्य न विकास है और न ही रोज़गार। इसलिए इतनी बड़ी धानराशि दिनी तमाशे पर होम कर दी गई।

 

निर्माण मजदूरों की पंचायत में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की कि प्रदेश के सभी 23 लाख मजदूरों का पंजीयन किया जाएगा। यह घोषणा करते समय मुख्य0मंत्री इतने उत्साहित हो उठे कि उन्होंने पंजीयन कार्य में लापरवाही बरतने अफसरों को हथकड़ी लगा कर सिधे जेल भेजने की चेतावनी भी दे डाली। इस घोषणा का करतल ध्वनी से स्वागत करने वाले मजदूर यह नहीं जानते कि कि यह सरकार निकम्मे तथा भ्रष्ट अफसरों की कितनी हिमायती है। सिंहस्थ घोटाले में दोषी एक अफसर को जेल भेजने की जगह शिवराज सरकार ने क्लीन चिट दी। स्वास्थ्य घोटाले में लिप्त वरिष्ठ आई.ए.एस. अफसर को सरेआम बचाया। पुलिस प्रशासन में भ्रष्टाचार फैलाने वाले आई.पी.एस. अफसर को इसी सरकार ने अभयदान दिया। ऐसे अनेक उदाहरण है, जहाँ सरकार ने खुलकर भ्रष्ट अफसरों का 'उध्दार' किया। ऐसी सरकार निर्माण मजदूरों के पंजीयन में लापरवाही बरतने वाले अफसरों को हथकड़ी लगा कर जेल भेजने की बात कहे तो इसे चुनावी साल का झुनझुना ही समझना बेहतर होगा।

 

निर्माण मजदूर पंचायत को शिवराज सिंह ने घोषणा की कि मज़दूरों के बेटे-बेटियों के जनम से लेकर रोज़गार और शादी-ब्याह की ज़िम्मेदारी भी सरकार की है। इतना ही नहीं, 60 साल से अधिक उम्र के मज़दूरों को 800 रुपए प्रतिमाह पेंशन देने और उनके अंतिम संस्कार तक की व्यवस्था सरकार द्वारा करने की घोषणा की गई। जहाँ तक मज़दूरों को पेंशन देने का सवाल है तो यह घोषणा भी धूर्तता भरी लगती है, क्योंकि केन्द्र सरकार द्वारा वृध्दावस्था पेंशन के रूप में 275 रुपए प्रतिमाह सहायता दी जा रही है। अगर शिवराज सरकार द्वारा घोषित पेंशन के 300 रुपए भी इसमें शामिल कर लिए जाएं तो यह राशि 375 रुपए हो जाती है। लेकिन हकीकत यह है कि अगर राज्य सरकार द्वारा घोषित पेंशन योजना लागू हो गई तो हरेक मज़दूर को सिर्फ़ 300 रुपए ही मिलेंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि केन्द्र की वृध्दावस्था पेंशन के 275 रुपयों में यह सरकार मात्र 25 रुपए मिलाएगी। इस मामूली से अंशदान के बल पर सरकार केन्द्र की योजना पर अपना लेबल चस्पा करने जा रही है, जो मज़दूरों के साथ खुलेआम धोखा है। ऐसा ही कारनामा किसानों को कृषि ऋण के संबंध में पहले ही किया जा चुका है। गौरतलब है कि अब तक किसानों को कृषि कार्यों के लिए मिलने वाले ऋण पर 14 प्रतिशत ब्याज लिया जाता था। केन्द्र सरकार ने किसानों को राहत देते हुए इसमें सात प्रतिशत कमी और 7 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध  करवाना शुरू कर दिया। शिवराज सरकार ने इसमें दो प्रतिशत की और कटौती की और यह प्रचारित किया कि राज्य सरकार 5 प्रतिशत ब्याज दर पर किसानों को ऋण उपलब्ध करवा रही है। जबकि यह हकीकत यह है कि राज्य सरकार के पास यह योजना लागू करने के लिए बजट ही नहीं है। इसलिए यह योजना वर्ष 2009 से लागू होगी। तब तक नई सरकार अस्तित्व में आ चुकी होगी। जिस भावी सरकार का अभी कोई स्वरूप ही नहीं है, उस सरकार के नाम पर अभी से घोषणा करना क्या किसानों के साथ धोखाधाड़ी नहीं है ? शिवराज सरकार ऐसी धोखाधाड़ी करने में माहिर हो चुकी है। प्रधानमंत्री सड़क योजना, रोजगार गारंटी योजना, ग़रीबों को सस्ता अनाज योजना जैसी कई योजनाओं में मामूली रद्दी बदल कर यह सरकार उन्हें अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रही है।

 

ऐसे में निर्माण मज़दूरों के जीवन से मरण तक की व्यवस्था की जिम्मेदारी ओढ़ने की घोषणाओं की तफ्सील से व्याख्या करना ज़रूरी है। सरकार की नाकामी के कारण प्रशासन तंत्र कितना लुंज-पुंज हो गया है। इसके उदाहरण् आए दिन अखबारों की सुर्खियों में रहते हैं। रिश्वत न मिलने पर प्रसूताओं को सड़क पर धाकेलने, उनके नवजात बच्चों की दर्दनाक मौत और सरकारी अस्पतालों में ग़रीबों की फजीहत के बारे में सब अच्छी तरह जानते हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में मज़दूरों और उनके परिजनों को मुफ्त इलाज मिल सकेगा, इसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं है। जिस प्रदेश में अनाथ लोगों की मृत्यु पर दाह संस्कार के लिए दान या चंदा किया जाता हो, वहाँ मजदूरों के दाह संस्कार की व्यवस्था सरकार जुटा सकेगी, इस पर कौन विश्वास करेगा ? इसके अलावा मजदूरों के बच्चों को पढ़ा-लिखा कर कलेक्टर-एसपी बनाने की मुख्यमंत्री की घोषणा कितनी कारगर होगी यह भी बताने की ज़रूरत नहीं है।

 

दरअसल प्रदेश की शिवराज सरकार को यह अहसास हो गया है कि दोबारा सत्ता में वापसी संभव नहीं है। इसलिए हवा-हवाई घोषणाएँ करते जाने में उसे कोई बुराई नज़र नहीं आती है। चूंकि ये तमाम घोषणाएँ व्यावहारिक नहीं हैं, इसलिए उन पर अमल करना भी संभव नहीं है। ऐसे में अगली सरकार में जब भाजपा विपक्ष की भूमिका में होगी, तब इन्हीं कागजी घोषणाओं के नाम पर सरकार को घेरने की कोशिश करेगीं, फिलहाल इन घोषणाओं के बल पर यह सरकार वोट बैंक की जुगत भिड़ा रही है, लेकिन आम आदमी इस चाल में आता नहीं लगता। कुल मिलाकर शिवराज सरकार की कागज़ी घोषणाएं उसी के पतन का मार्ग प्रशस्त करेंगी।

महेश बाग़ी