संस्करण: 01सितम्बर-2008

अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बढ़ती कीमतों का भारत पर असर

बिचौलियों पर लगे अंकुश

 

राजश्री रावत 'राज'

रीबी और महंगाई चक्की के ऐसे दो पाट हैं जिनके बीच लगातार करोड़ों लोग पिसते जा रहे हैं। दिनों दिन बढ़ती महंगाई और गरीबी की मार झेलते सिर्फ़ भारत के ही नहीं दुनिया भर के लोग परेशान हैं। खाने की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों की वज़ह से फिलीपींस, मिस्त्र, बंगला देश, अफ्रीका, अमेरिका आदि कई देशों में दंगे भड़के चुके हैं स्थिति बहुत विकराल रूप धारण कर चुकी हैं। विश्व बैंक के अध्यक्ष रोबर्ट जोलिक ने चेतावनी देते हुए कहा है कि शीघ्र ही यदि महँगाई दर काबू नहीं किया गया तो दुनिया को 10 करोड़ नए गरीब मिल जायेंगे।

इस बात से यह स्पष्ट हैं कि जब इतने लोगों पर गरीबी की मार होगी तो करोड़ों लोग दाने-दाने को मोहताज होंगे, और दूसरी ओर महंगाई और बढ़ जायेगी ?

विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पिछले दिनों खाद्य संकट पर बैठक बुलाई थी। इसमें भारत के वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम भी शामिल हुए थे। उन्होंने कहा कि भारत में बढ़ती महंगाई चिंता का विषय है इसके लिए पेट्रोल एवं खाद्य पदार्थों की कीमतों पर काबू करना अत्यंत आवश्यक है।

पिछले 3-4 वर्षों में खाद्य पदार्थों की कीमते लगभग दोगुनी हो गई हैं। कम आय और मध्यम वर्ग को भोजन पर खर्च बढ़ गया हैं इसलिए गरीबों की संख्या बढ़ती जा रही है। यह बात भी यद्यपि सही है कि कुछ हद तक लोगों की आय में भी बढ़ोत्तरी हुई है परन्तु आय के मुकाबले अनाज के कीमतों में भी बेतहाशा वृध्दि हुई है। इस वृध्दि के लिए बढ़ती हुई मांग और खराब मौसम को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। मौसम में भी लगातार परिवर्तन होता जा रहा है और इस बदलते हुए खराब मौसम की वज़ह से कई देशों में फसलें चौपट हो गई हैं। इसके अलावा जैविक ईंधान के लिए जमीनों के इस्तेमाल किये जाने के कारण अनाज के उत्पादन में कमी आई है। गेहूँ, चावल, दाल और अन्य अनाजों की कीमतों में तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है ? गेहूँ की कीमतों में 130: चावल पर 75: और सोयाबीन की कीमतों में 90: वृध्दि हुई है। अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में भी इन बढ़ती कीमतों से हलचल मची हुई है। भारत, चीन और वियतनाम में पिछले दिनों खाद्यान्न संकट के लिए भारत की बढ़ती आर्थिक समृध्दि और उसके कारण अधिक खाद्य पदार्थों के उपयोग को जिम्मेदार ठहराया। भारत के लोगों के अधिक खाने से उनके पेट में क्यों दर्द हो रहा है ? यह समझ नहीं आया।

यह एक तथ्य है कि भारत तेज़ी से विकासशील देशों की रेस में आगे जाता जा रहा है। आर्थिक दृष्टि से भारतीय अधिक समृध्द होते जा रहे हैं। यह बढ़ती हुई समृध्दि कई देशों की ऑंखों में खटक रही हैं।

इस बढ़ती हुई महंगाई के पीछे क्या वास्तव में खाद्यान्न संकट ही जिम्मेदार है ? इस प्रश्न का जवाब ढूंढ़ने पर यह पता चलता है कि देखा जाये तो उत्पादन पिछले कुछ वर्षों की तुलना में बढ़ा ही है। उसका कारण है उत्पादकों ने तो अपने दाम उतने अधिक नहीं बढ़ाए हैं उन्हें भी अधिक लाभ नहीं मिल रहा है परन्तु उपभोक्ताओं को बहुत बढ़ी कीमतों में माल मिल रहा है अर्थात बीच के बिचौलिए और रिटेलर ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की बढ़ती कीमतों, (जो कि सरकारों के आयात-निर्यात नीति के कारण प्रभावित होती हैं।) को देखकर उपभोक्ताओं को ऊँचे दामों पर वस्तुए देना प्रारम्भ कर देते हैं। कीमतों के बढ़ाने के साथ-साथ वे सामान की यात्रा दस से बीस प्रतिशत तक कम कर देते है। वे अपने पैकेटों में खुलेआम लिख कर बताते हैं कि मात्रा कम कर दी गई है फिर भी सरकारी स्तर पर इन पर कोई रोक-टोक या पाबंदी नहीं लगाई जाती है। बेचारा उपभोक्ता अधिक कीमत देकर भी कम माल लेने को विवश है। जब किसी सामान की लागत नहीं बढ़ी हैं। उत्पादक को अधिक पैसा नहीं मिल रहा है। सरकार भी महंगाई बढ़ने से चिंतित दिखाई देती है, परन्तु वस्तुओं के दाम बढ़ते जा रहे हैं तो प्रश्न यह उठता है कि यह बीच में कौन है जो महंगाई बढ़ाने में भूमिका निभा रहा है ? और इन बिचौलिए पर सरकार की निगाह क्यों नहीं पड़ती, या पड़ती है तो मौन सहमति क्यों है ? इन प्रश्नों के जवाब यदि हमें मिल जायें तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि यह सारा खेल किसकी मिलीभगत से किया जा रहा है ? और क्यों महंगाई बढ़ती जा रही है ?

राजश्री रावत 'राज'