संस्करण: 01सितम्बर-2008

8 सितम्बर-विश्व साक्षरता दिवस पर विशेष

कठिन डगर है साक्षरता की

डॉ. गीता गुप्त

हान दार्शनिक प्लेटों के अनुसार-'अज्ञानी रहने से अच्छा है जन्म न लेना क्योंकि अज्ञान ही सारे दु:खों की जड़ है।' साक्षरता का अर्थ केवल पढ़ना-लिखना सीख लेना ही नहीं है, इसकी सार्थकता तभी है जब हम प्राचीन रूढ़िवादी मान्यताओं से पूर्णत: मुक्त हो सही मायनों में अपना विकास कर सकें। भारत में करोड़ों व्यक्ति निरक्षर हैं। विशेषकर 15 से 35 वर्ग के स्त्री-पुरुषों का निरक्षर रहना देश की उन्नति में बाधाक है। किसी भी देश के सामाजिक तथा आर्थिक विकास में जो अनेक बाधाएँ हैं उनमें अशिक्षा सर्वप्रमुख है।

 

निरक्षरता के खिलाफ़ ब्रिटिश पराधीनता के आरम्भिक वर्षों से ही आवाजें उठने लगी थीं। शिक्षा को सामाजिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक पुनर्जागरा का एक सशक्त माध्यम मानकर राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, पण्डित ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, पंडित मदनमोहन मालवीय आदि समाज-सुधारकों ने जनशिक्षा हेतु पहल की। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात निरक्षरता-उन्मूलन हेतु पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से शासकीय स्तर पर प्रयास आरम्भ किये गये। पहली पंचवर्षीय योजना में प्रौढ़ शिक्षा को एक कार्यक्रम के रूप में शामिल किया गया। दूसरी पंचवर्षीय योजना में प्रौढ़ शिक्षा को सामुदायिक विकास कार्यक्रम के साथ जोड़ा गया। तीसरी, चौथी और पांचवी पंचवर्षीय योजनाओं में केन्द्रीय तथा राज्य स्तर पर प्रौढ़ शिक्षा के अनेक महत्वपूर्ण कार्यक्रम जैसे-कृषक प्रशिक्षण तथा कार्यात्मक साक्षरता शिक्षा के अनेक महत्वपूर्ण कार्यक्रम जैसे-कृषक प्रशिक्षण तथा कार्यात्मक साक्षरता कार्यक्रम, 15 से 25 वर्ष के युवाओं के लिए औपचारिकेतर शिक्षा कार्यक्रम, राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम आदि आरम्भ किये गये।

 

छठी पंचवर्षीय योजना में न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम में प्रौढ़ शिक्षा को सम्मिलित करके इसकी प्राथमिकता को रेखांकित किया गया, यह मानकर कि सामाजिक रूप से जागरूक तथा साक्षर समुदाय उत्पादकता, स्वास्थ्य, परिवार-नियोजन तथा जीवन-स्तर जैसे क्षेत्रों में उन्नति के लिए आवश्यक है। सन् 1990 यानी अन्तरर्राष्ट्रीय साक्षरता वर्ष में 19 से 35 आयु वर्ग के समस्त निरक्षर व्यक्तियों को सन् 2000 तक साक्षर बनाने का लक्ष्य निधर्रित किया गया था, जो पूण्र्  न नहीं हो सका। अभी तक प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को साक्षर बनाना मात्र था। परन्तु नये कार्यक्रम के अन्तर्गत साक्षरता के साथ-साथ कार्यात्मकता तथा जागरूकता को भी प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया। इस प्रकार प्रौढ़ शिक्षा के तीन तत्व निधर्रित हुए-साक्षरता, कार्यात्मकता और जागरूकता।

 

प्राथमिक शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा सर्वसुलभ कराने हेतु किये गये विभिन्न प्रयासों के बावजूद निरक्षरों की संख्या निरंतर बढ़ती ही गयी है। आज यह समस्या एक प्रमुख चुनौती के रूप में देश के समक्ष उपस्थित है। समूचे विश्व में निरक्षरता के समूल उन्मूलन की दिशा में यूनेस्को ने प्रयास प्रारम्भ किये और पहले उसके द्वारा सन् 2000 तक सम्पूर्ण विश्व को साक्षर बनाये जाने की घोषणा की गयी थी, जो विफल रही। तब हमारे देश ने भी संकल्प लिया था कि हम सन् 1995 तक इस देश से निरक्षरता के उस कलंक को मिटा देंगे जिसे महात्मा गांधी ने 'भारत का अभिशाप' कहा था। लेकिन उक्त संकल्प पूर्ण न हो सका। वस्तुत: निरक्षरता के ही कारण भारतीय जन समुदाय राष्ट्रीय विकास धारा से नहीं जुड़ पा रहा है अत एवं योजनाओं का लक्ष्य पूर्ण नहीं हो पा रहा है।

 

'जन-कार्यात्मक साक्षरता कार्यक्रम' इस दिशा में उठाया गया एक ठोस और प्रभावकारी कदम था। कार्यात्मक साक्षरता से तात्पर्य है-साक्षरता एवं गणित में आत्मनिर्भर होना। अपनी गिरी हुई हालत के कारणों की जानकारी पाना और संगठित होकर तथा विकास-कार्यों में भाग लेकर अपनी दशा सुधारने की चेष्टा करना। अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए हुनर सीखना। राष्ट्रीय एकता, पर्यावरण की रक्षा, महिला एवं पुरुषों की समानता और छोटा परिवार जैसे सामाजिक मूल्यों को अच्छी तरह समझना। कार्यात्मक साक्षरता को यदि जन-कार्यक्रम के रूप में ईमानदारीपूर्वक चलाया जाए तो सफलता सुनिश्चित है क्योंकि इसके महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं :-
1.साक्षरता को लोगों का मिशन बनाने के लिए।
2. मिशन में सभी संस्थाओं का सहयोग पाने के लिए।
3. साक्षरता-कार्यक्रमों को युवाओं के लिए एक चुनौती बनाने के लिए।
4. महिलाओं की सहभागिता पर बल देने के लिए।
आज विश्व की जनसंख्या का लगभग आधा भाग महिलाओं का होने के बावजूद वे शिक्षा सहित अनेक मामलों में पुरुषों से पिछड़ी हुई हैं। केन्द्रीय योजना आयोग द्वारा 11वीं पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत मानव संसाधान विकास मंत्रालय को सन् 2012 तक 85% साक्षरता का लक्ष्य दिया गया है पर केन्द्र सरकार ने सहस्त्राब्दी लक्ष्य के अन्तर्गत दावा किया है कि देश सन् 2015 तक पूर्ण रूप से साक्षर हो जाएगा। अधिकारिक रूप से देश की जनगणना करने वाली एजेंसी नेशनल सैम्पल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन ने साक्षरता पर एक ताज़ा रपट प्रस्तुत की है। तदनुसार, इस समय भारत में प्रतिवर्ष साक्षरता की वृध्दि दर 1.5% है। अभी भारत की साक्षरता दर 65% है। विशेषज्ञों की राय में 65% से 85% तक की वृध्दि चार वर्षों में मुश्किल ही नहीं, असम्भव है।

 

वास्तविकता यह है कि देश के आठ बड़े राज्यों की 70% आबादी निरक्षर है। इस आंकड़े को नज़र अंदाज करके केन्द्र सरकार ने आगामी सात वर्षों में सम्पूर्ण साक्षरता का लक्ष्य निधर्रित किया है। मध्यप्रदेश राजस्थान, छत्तीसगढ़, आन्र्धा प्रदेश, असम, मेघालय, उड़ीसा, उत्तर-प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, अरूणाचल प्रदेश, झारखण्ड और बिहार भारत के ऐसे राज्य हैं जहाँ साक्षरता 64.8% से भी कम है। इन राज्यों में केन्द्र के साक्षरता मिशन हेतु चलाये जा रहे सर्वे शिक्षा अभियान में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। सन् 2001 की जनगणना-आंकड़ों के अनुसार मधयप्रदेश की साक्षरता दर 63.7% है। इसमें पुरुषों की साक्षरता 76.10% तथा स्त्रियों की 50.30% ही है।

 

उल्लेखनीय है कि केरल, मिजोरम, लक्षद्वीप, गोवा, चण्डीगढ़, दिल्ली, पांडिचेरी, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और दमन एवं दीव 80% से अधिक साक्षरता वाले राज्य हैं। केरल के मलप्पुरम जिले की नीलांबुर पंचायत अपनी ज्योतिर्गमय परियोजना के ज़रिये पूर्ण साक्षरता प्राप्त करने वाली देश की पहली पंचायत बन गयी है। इस परियोजना का लक्ष्य लोगों को कम से कम चौथी कक्षा तक साक्षर बनाना है। पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, तमिलनाडु, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, नागालैंड और कर्नाटक में साक्षरता 65 से 80 फ़ीसदी है।

 

राजस्थान साक्षरता दर में तेज़ी से वृध्दि करने वाला राज्य है। वर्ष 1991 में वहाँ साक्षरता दर 38.55% थी, जो सन् 2001 में बढ़कर 61.3% हो गयी है। छत्तीसगढ़ में महिलाओं की साक्षरता दर में तेज़ी से वृध्दि हो रही है। वहाँ सन् 1991 में साक्षरता दर 27.52% थी जो सन् 2001 में 52.40% हो गयी है। कर्नाटक के कुछ जिलों में 'ईच वन टीच टू' (हरेक पढ़ाये दो को) कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके तहत 11वीं एवं 12वीं के विद्यार्थियों को 20 अंकों का प्रोजेक्ट दिया जाता है जिसमें प्रत्येक छात्र पर दो निरक्षर वयस्कों को पढ़ाने की जिम्मेदारी होती है।

 

बहरहाल, मधयप्रदेश के सामने साक्षरता के लक्ष्य हेतु कड़ी चुनौतियाँ हैं। यहाँ राज्य के 32% विद्यालयों में केवल एक शिक्षक हैं। 33.75% विद्यालयों में कोई महिला शिक्षक नहीं है। 1.89% विद्यालयों में शिक्षक ही नहीं हैं। शिक्षक के हज़ारों पद रिक्त पड़े हैं। 48.89% शिक्षक अप्रशिक्षित हैं। यही नहीं, संविदा के आधाार पर नियुक्त अस्थायी शिक्षक शिक्षा के रथ को जैसे तैसे खींच रहे हैं। स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति न करके सरकार अपना धान तो बचा रही है लेकिन इससे शिक्षा की जो क्षति हो रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है।

 

केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य व शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल का कहना है कि-'साक्षरता के सारे दावे झूठे साबित हो चुके हैं। साक्षरता की बजाय स्कूली शिक्षा में सुधाार करना चाहिए। केरल जैसे जिन राज्यों में साक्षरता की दर वृध्दि का उदाहरण दिया जा रहा है, वहाँ बेहतर स्कूली शिक्षा के कारण यह संभव हुआ है। मधय-प्रदेश समेत देशभर में साक्षरता का काम ठप्प पड़ा है। ऐसे में सरकार का यह दावा चौंकाने वाला है कि सन् 2015 तक हम पूर्ण साक्षरता का लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे। वस्तुत: 100% छोड़िए, 80% तक पाना भी बहुत मुश्किल है।' वस्तुस्थिति यह है कि ज्यादातर बच्चे अपनी स्कूली शिक्षा भी पूर्ण नहीं करते और स्कूल जाना बीच में ही बन्द कर देते हैं। सर्व शिक्षा अभियान की एक रपट के अनुसार प्राथमिक व मिडिल कक्षाओं में विद्यालय छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या लगभग 17% तथा लड़कों की संख्या क्रमश: 14.1% और 12.9% है। इन बच्चों के स्कूल छोड़ने का कारण उनके परिवार की कमज़ोर आर्थिक स्थिति है। सरकारी दावे के अनुसार स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या लगभग एक लाख है परन्तु राज्य में बाल श्रमिकों की संख्या दस लाख से भी अधिाक है।

 

यद्यपि केन्द्र ने 11 वीं पंचवर्षीय योजना में शिक्षा हेतु 850 अरब रुपयों का बजट निधर्ाारित किया है जो 10वीं पंचवर्षीय योजना के शैक्षिक बजट में पाँच गुना अधिाक है, तथापि देश में शिक्षा की बदहाली चिंताजनक है। यह भी सच है कि देश में हर गली-चौराहे पर शिक्षा-संस्थान खुल गये हैं, पर उनमें से अधिाकांश गुणवत्ता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। आज भी देश के लगभग साढ़े तीन करोड़ बच्चे पढ़ाई से वंचित हैं। यही नहीं स्कूल जाने वाले करोड़ों बच्चे नये युग के अनुरूप शिक्षित नहीं हो पा रहे हैं। प्रसिध्द शिक्षाविद् टी.के. ओमान के मतानुसार-'शत-प्रतिशत साक्षरता प्राप्ति की अपेक्षा हमें शिक्षा को बेहतर बनाने पर ज़ोर देना चाहिए।'

 

सचमुच यह हमारे लिए दु:खद और शर्मनाक है कि आज़ादी के साठ बरस बाद भी देश निरक्षरता के अभिशाप से ग्रस्त है। इससे मुक्ति हेतु सरकार के ईमानदार प्रयास के अलावा जन-सहयोग भी नितान्त आवश्यक है।

 

डॉ. गीता गुप्त