संस्करण: 01सितम्बर-2008

युवाओं की भागीदारी से आयेगी

राजनीति में शुचिता

डॉ. सुनील शर्मा

चुनावों का समय निकट है अभी देश के चार बड़े राज्यों मे विधानसभा के चुनाव होने वाले है उसके तत्काल बाद ही लोक सभा के चुनाव आ जावेगें। इन चुनावों के जरिये जन प्रतिनीधि बनने के लिये हर वर्ग बेकरार है। सांसद व विधायक पद की टिकिट के लिये दावेदारियॉ बढ़ती जा रही है। इन दावेदारों में से कोई एक विधानसभा और लोकसभा से चुनकर विधायिका व संसद में पहुचेगा फिर प्रदेश तथा देश का भविष्य निधर्रित करेगा। परन्तु पिछले कुछ वर्षो से हमने अपने जनप्रतिनिधिओं का नैतिक पतन देखा है। हमारे जन प्रतिनिधी अपने पथ से भटके से प्रतीत होते है। वो येन केन प्रकरणेन सत्ता में बने रहना चाहते है। इनकी सत्ता लिप्सा से त्रस्त जनता अब इनके विकल्प के तलाश में है। इसी मन: स्थिति में आज जन मानस की नजरे युवा शक्ति की ओर आशावान है। क्योकि हम सभी मानते है कि युवा का मतलब भविष्योन्मुखी होता है। युवा होने का अर्थ लीक से हटकर कुछ करने वाला होता है। युवा मूर्तिभंजक होता है, बेपरवाह और क्रांतिकारी होता है। कहीं न कहीं इस तरह की छवि युवाओं को राजनीति में आमंत्रित करने का मानस बनाती है। आज युवाशक्ति शब्द एक मुहावरा बन चुका है। आज जन मानस असर हीन होते पुरानी पीढ़ी के नेतृत्वकर्ताओं को दरकिनार कर युवाशक्ति और युवाओ नेतृत्वकर्ता के रूप में देखना चाहता है। वास्तव हमारी राजनीतिक व्यवस्था दूषित हो चुकी है और सरकारें सिर्फ अवसरवादी गठजोड़ बन गई है। आज एक दुसरे को कोसने वाले नेता कल सरकार में साथ बैठेगें। राजनीतिक आस्था और विचार रातों-रात बदल रहे हैं। आज ठेकेदार,हिस्ट्रीशीटर और बेईमान राजनैतिक व्यवस्था के केन्द्र बन गए है, सारी व्यवस्था भी इनके हित साधाने में लगी हुई प्रतीत होती है। ऐसे समय में युवाओं का राजनीति में आगमन ताजगी की आशा जगाता है। लीक से हटकर कुछ कर दिखाने की संभावना पैदा करता है। चूंकि हमारा जन मानस अब युवाओं को सत्ता के केन्द्र में देखने उत्सुक है और व्यवस्था संचालन भी उन्हीं के हाथो सौंपना चाहता है जो वास्तव में इस डिजिटल शताब्दी की जरूरत है। ऐसे में इस बात पर भी मनन करना जरूरी हो जाता है। कि क्या हमारे देश की युवा पीढ़ी राजनीति की बागडोर संभालने के योग्य है? क्या हमारे देश की युवा पीढ़ी वास्तव में मूर्तिभंजक और क्रांतिकारी है ? जहां तक आजादी के साठ वर्षो की बात है तो हमने आर्थिक प्रगति तो की है पंरतु हमारे नैतिक मूल्य गिरे है। अंधाविश्वास और धर्मान्धाता अब भी हावी है। निरक्षरता और गरीबी के पंजे अब भी बडी आबादी को अपने कब्जें में जकड़े हुए है। ऐसे में हम नए विचारवान युवाओं को नेतृत्व कर्ता के रूप में देखना तो चाहते हैं परंतु हमारा मनशंकित हो जाता है कि हमारी युवा पीढ़ी नैतिकता के प्रति कितनी वचनबध्द है? पर्यावरण के मुद्दे पर कितनी संवेदनशील है ? हम देखते है कि सवाल अंधविश्वास का हो या फिर दहेज या अंतर्जातीय विवाह का या फिर आर्थिक नीति का। हमारे देश मे युवाओं और बुर्जुंगों की इन पर राय में कोई खास फर्क नहीं है हमारे युवा अब भी जाति और धर्म की परिधि से बाहर नहीं हो पाए है ऐसे में हम मूर्तिभंजक और क्रांतिकारी का मायना युवाओं में कैसे खोजेगे।

 

आज हम युवा के नाम पर सिर्फ महानगरीय युवा की बात करते है, परन्तु हमारी युवा सोच में दलित आदिवासी युवा भी होना चाहिए तथा शहरी झोपड़ पट्टी का युवा और गांव की लड़की भी होना चाहिए। वास्तव में पिछले पन्द्रह बीस वर्षो में नई आर्थिक नीतियों की आड़ में कदम बढ़ाता नवधानाढय वर्ग अब राजनीति के केन्द्र में आना चाहता है जो कि युवाओं को अपना हम कदम बनाना चाहता है । हालांकि राजनीति की बागडोर युवाओं के हाथें में सौपनी चाहिए इसमें कोई दो राय नही है तथा यह सत्य है कि आगामी लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में जो दल युवाओं को वरीयता देगा वही सत्त केन्द्र में होगा। लेकिन इस प्रक्रिया में उन युवाओं को शामिल करना होगा जिनके मन में ग्रामीण भारत की छवि है जो अंधाविश्वास और रूढ़ि का विरोधा करने का होसला रखते है। जो साम्प्रदायकिता को सत्ता की सीढ़ी नहीं मानते हों तथा पर्यावरण सुरक्षा के प्रति स्पष्ट छवि जिनके दिमाग में हो और जो विज्ञान सम्मत समाज के निर्माण के पक्षधार हो। वास्तव में ऐसे युवाओं की देश में कमी नहीं है और ये वे युवा है जिन्हें देश की बागडोर सौंपी जा सकती है । इस दिशा में वर्तमान में केन्द्र की युपीए सरकार ने अच्छा प्रयास किया है। अपने मंत्रीमण्डल में कई युवाओं को अहम् जिम्मेदारी सौंप कर देश में युवा नेतृत्व के विकास का प्रयास किया है। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस पार्टी के युवा महासचिव श्री राहुल गांधी भी देश की तरूणाई को एकत्र करने का प्रयास कर रहे है। इनके द्वारा देश भर में अच्छे व विचारवान युवाओं की खोज के काफी प्रयास किये जा रहे है। उनकी होसलाआफजाई की जा रही है। वर्तमान की राजनीति से जन मानस में जो भय बैठ गया है। उसे इन युवाओं की भागीदारी से दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। श्री राहुल गांधी राजनीति में सुचिता का पूरा प्रयास कर रहे। उनके ये कदम निश्चित रूप देश की राजनीति में युवाओं की भागीदारी को बढायेगें। वास्तव में देश को ऐसे ही प्रयास और नेतृत्व की जरूरत है।
 

डॉ. सुनील शर्मा