संस्करण: 01सितम्बर-2008

म.प्र. में एक हजार दिन की हकीकत-

आम जनता की फजीहत ही फजीहत

अजय सिंह 'राहुल'

पने मुँह मियां मिट्टू बनकर मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने अपने एक हजार दिन पूरे करने की खुशी में जिन उपलब्धियों के आंकड़ों का ढिंढोरा पीटा है, वह ज़मीनी हकीकतों का सच नहीं है। हकीकत तो यह है कि समाज के हर वर्ग की फजीहत बढ़ी है।

झूठे वायदों, घोषणाओं और आश्वासनों की लम्बी चौड़ी फेररिस्त को हवा में उछाल कर आम जनता को भ्रमित करने की फितरत में माहिर भाजपा के नेतागण सत्ता के मद में इतने अधिक मदमस्त हो गये हैं कि वे कागजों में लिखी योजनाओं और कार्यक्रमों को ही अपनी उपलब्धि मान रहे हैं। जब जब राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेशों में योजनाओं, कार्यक्रमों और क्रियान्वयन के सर्वेक्षण की रिपोर्ट सामने आती है तब उपलब्धियों के नाम पर खुशफहमी पालने वाली इस सरकार की पोल खुलकर जनता के सामने आ जाती है। प्रदेशवासियों का शर्म से सिर झुक जाता है जब सर्वेक्षणों की रिपोर्ट में कहा जाता है कि मध्यप्रदेश, विकास, जनकल्याण और जनसुरक्षा के मामलों में बहुत पीछे है। भाजपा की सत्ता जिन एक हजार दिनों के कामकाजों पर दम्भ कर रही है उन कामों का फायदा सर्वाधिक यदि किसी को हुआ है तो वह उन लोगों को हुआ है जो आर.एस.एस. विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, जैसे कट्टरपंथी विचार धारा से जुड़े हैं। ऐसे संगठनों के लोगों को प्रदेश में से जुड़े हैं। ऐसे संगठनों के लोगों को प्रदेश में नग्न-नर्तन की खुली छूट मिली है। ये लोग कहीं भी, कभी भी, किसी भी सार्वजनिक स्थान, सरकारी कार्यालय या विभिन्न धर्मावलंबियों के परिसरों में प्रवेश कर धींगामस्ती कर सकते हैं। स्कूलों, कालेजों, अस्पतालों, पुलिस थानों, होटलों गली-मुहल्लों और सड़कों-चौराहों पर उपद्रव मचाने के लिए वे लोग निरंकुश और स्वतंत्र हैं। न तो शासन-प्रशासन इन पर कोई ऊंगली उठा सकता है और न ही पुलिस इनका कुछ बिगाड़ सकती है। इन संगठनों के उपद्रवकारियों से आम जनता तो आतंकित रहती ही है, पुलिस भी किसी तरह की कार्यवाही करने में हिचकिचाती है। लगने लगा है कि शिवराज सिंह सरकार ने पूरा का पूरा प्रदेश इन हुड़दंगर् कत्ताओं के हवाले कर दिया है।

प्रदेश में 'ला एंड आर्डर' तो कहीं है ही नहीं। भ्रष्टाचार की जड़े गहरी जम गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में जितनी भी योजनाएं चल रही हैं और जिनमें काम दिखाई दे रहा है, उनमें से अधिकांश योजनाएं केन्द्र शासन की हैं और उनका बजट भी केन्द्र से ही मिला है। केन्द्रीय योजनाओं को राज्य की योजनाएं बताकर सरकार उनके क्रियान्वयन के नाम पर जनता को गुमराह कर रही है। किसान त्रस्त हो रहे हैं। खाद, बीज और सिंचाई की दिक्कतों से वह छुटकारा नहीं पा रहा है। बिजली व्यवस्था न कर पाने में अपनी कमजोरी को छुपाकर यह सरकार अपना दोष केन्द्र के माथे मढ़ने से बाज नहीं आ रही है। गांवों में खेती किसानी के लिए और घरेलू बिजली की आपूर्ति की समस्या के निराकरण के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठा रही है। किसानों की बिजली के बिलों की माफ़ी और किसानों की ऋण मुक्ति के लिए बातें तो खूब बढ़ चढ़कर की जा रही हैं किंतु इस तरह की घोषणाओं के परिणामों का गांवों में कोई असर नहीं देखा जा रहा है। मजदूर वर्ग के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन तो खूब किया जा रहा है, किंतु यह केवल दिखावा भर है। मजदूरों की सुरक्षा योजनाओं में क्रियान्वयन में नाकामयाबी ही मैदानी हकीकत है। आम जनता को भावनात्मक रूप से प्रभावित करते रहने के लिए कई योजनाओं के आकर्षक और लुभावने नाम रख दिए गये हैं। मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना का नामकरण भी इन्हीं में से एक है। यह योजना 'नाम बड़े और दर्शन खोटे' की कहावत को चरितार्थ कर रही है। योजना की शुरूआत में ही सत्ता और प्रशासन के बीच जिस तरह के द्वन्द्वों ने जन्म लिया, उससे इस योजना की संचालन प्रक्रिया के पीछे की हकीकतें उजागर हो चुकी हैं। योजना के तहत सस्ता चावल और गेहूँ वितरित करने की घोषणा के बल 'राजनीति-स्टंट' सिध्द हो रही है। शिक्षा और जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में इन हजार दिनों में जो नजारें दिखाई दिए उनपर जरा भी गर्व महसूस नहीं किया जा सकता। शिक्षण संस्थाए हुड़दंगियों के हवाले हो गई और अस्पताल तथा स्वास्थ्य सेवाओं/भ्रष्टाचार के प्रमुख अड्डों का रूप धारण कर लिया है। आये दिन जनस्वास्थ्य और शिक्षा की योजनाओं के क्रियान्वयन के बारे में समाचार पत्रों में जो पढ़ने को मिलता रहता है उससे सरकारी एजेंसियों के अमानवीय कृत्य उजागर होते जा रहे हैं। महिलाओं के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए विभिन्न लोक लुभावन योजनाओं के माध्यम से काम हो रहे हैं। उनके परिणाम जब सामने आते हैं, तो सरकार के प्रति वितृष्णा होने लगती है। कन्यादान योजना के मैदानी सच की खबरें जब सामने आती है तब लगता है कि यह योजना मजाक बन रही है। पैसें की लालच में गरीब लोग दुबारा शादियां करने लगते हैं। इससे सरकार की क्रियान्वयन एजेंसियों की कमजोरियां सामने आ रही हैं। लाड़ली लक्ष्मी योजना आंकड़ों के खेल से ज्यादा कुछ भी नहीं है। विकास, जनकल्याण और गरीबों के उत्थान के कार्यों में अपनी नाकामयाबियों को छुपाकर लोगों का धयान बटाकर सरकार उनके पारिवारिक कार्यक्षेत्रों में प्रवेश कर उनके सामाजिक रीति रिवाजों में मदद का बहाना ढूंढकर उन्हें भ्रमित करती जा रही है। गरीब परिवारों को उनके सामाजिक सरोकारों और रस्मों रिवाजों के लिए सहयोग प्रदान करना एक अच्छी पहल है, किंतु इसके पीछे राजनीति के अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति करने की नियत का स्वागत कतई नहीं किया जा सकता। महिलाओं के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए एक तरफ तो सरकार वाहवाही लूटने में पीछे नहीं रहना चाहती किंतु इसके दूसरी तरफ महिलाओं के उत्पीड़न के बढ़ते आंकड़ों के प्रति सरकार का रवैया बहुत ही ढीला देखने को मिल रहा है। रात दिन महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों की सूची लम्बी होती जा रही है। हत्या, बलात्कार, जेवरों की लूट और उनको सार्वजनिक तौर पर प्रताड़ित किए जाने के समाचारों में कमी नहीं आ रही है। पुलिस और प्रशासन राजनैतिक दबावों के चलते अपनी भूमिका में निष्क्रिय है। इन हजार दिनों में महिलाओं की सुरक्षा के काम कहीं नहीं दिखें, किंतु उनपर हो रहे अत्याचारों के आंकड़ों में भारी इज़ाफा होता चला गया है।

कर्मचारी वर्ग को खुश रखने के लिए घोषणाओं का अम्बार लगाने वाली सरकार रात दिन कर्मचारियों के आंदोलनों, रैलियों, हड़ताल और कलमबंद करने जैसे विरोधों से घिरी हुई रहती है। कोई भी विभाग, उपक्रम या संस्थान ऐसा नहीं है जिसके कर्मचारी-अधिकारी आंदोलित न हुए हो। कर्मचारियों में व्याप्त असंतोष इस बात का प्रतीक है कि वे सरकार की अंदरूनी कमजोरी से अनभिज्ञ नहीं है। वे समझ रहे हैं कि आम चुनाव &