संस्करण: 01 मार्च-2010   

गडकरी की विवादास्पद ताजपोशी


 

महेश बाग़ी

            भाजपा अध्यक्ष पद पर नितिन गडकरी की ताजपोशी विवादों में घिर गई है। आरोप है कि जिस जगह पार्टी का अधिवेशन किया गया वह जगह विवादित है और भूमाफियाओं को लाभ पहुंचाने की गरज से इंदौर में उक्त स्थान का चयन किया गया। इतना ही नहीं, गडकरी एक विवादित कॉलोनी के उद्धाटन समारोह में भी कथित तौर पर शामिल हुए, जिसे लेकर भाजपा के ही एक वर्ग ने संघ प्रमुख को शिकायत की है। उधार अधिवेशन पर जिस तरह करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए गए, उससे भी भाजपा के ''पार्टी विद डिफरेंट'' के आदर्श पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। ख़ास बात यह रही कि तीन दिन चले अधिवेशन में पार्टी कोई दिशा तय नहीं कर सकी और एक बार फिर राम मंदिर का नारा उछाला गया।

          अधिवेशन में भाजपा अध्यक्ष गडकरी ने बड़े नेताओं को सीख दी कि वे कार्यकर्ताओं की चिंता करें। इसके ठीक विपरीत बड़े नेता अधिवेशन स्थल पर बने तंबुओं को छोड़ कर आलीशान होटलों में ठहरे। केंद्र में सत्ता का स्वाद चखने के बाद भाजपा पर 'प्रमोद महाजनी' संस्कृति हावी हो गई है। यही वजह है कि जब अध्यक्ष वीआईपी तंबू में रज़ाई ओढ़ कर ठंड से दो-दो हाथ कर रहे थे, तब बाकी नेतागण होटलों की ओर भाग रहे थे। इससे भाजपाइयों के ढोंग और तंबू के ढकोसले की हकीकत सामने आ गई। जो नेता अपने कार्यकर्ताओं के साथ दो रात नहीं गुज़ार सकते, उनसे पार्टी की बेहतरी की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? इससे यह भी ज़ाहिर हो गया है कि धन्ना सेठों की भाजपा में अब सादगी की कोई जगह नहीं है। अब भाजपा नेता भले ही यह कहें कि तंबू पर कम ख़र्च हुआ है, लेकिन इस बहाने यह पोल भी खुल गई कि तंबू कार्यकर्ताओं के लिए बनाए गए थे।

        गड़करी ने अधिवेशन में यह भी कहा कि परेशानी कार्यकर्ताओं से नहीं, बड़े नेताओं से है, तो इसका अर्थ यही है कि भाजपा में नेताओं और कार्यकर्ताओं में दूरी बढ़ती जा रही है। जो भाजपा कैडर बेस पार्टी होने का दंभ भरती आई है, उसके अध्यक्ष की यह टिप्पणी पार्टी की आंतरिक स्थिति बयान करती है। आज हालत यह है कि बड़े नेताओं को कार्यकर्ता फूटी आंख नहीं सुहाते हैं। उनकी पूछ परख केवल चुनावों के समय ही होती है। चुनाव हो जाने के बाद उन्हें दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंक दिया जाता है। कार्यकर्ताओं द्वारा अपनी उपेक्षा का दुखड़ा रोने पर मध्यप्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा यह टिप्पणी भी कर चुके हैं कि चुनाव में काम करने के लिए पार्टी ने उन्हें पीले चावल नहीं दिए थे। किसी भी लोकतांत्रिक पार्टी में नेता और कार्यकर्ता के बीच सिर्फ पद का अंतर होना चाहिए, किंतु भाजपा नेता खुद को सवर्ण और कार्यकर्ताओं को हरिजन समझते हैं। ऐसे नेताओं को यह ग़लतफहमी भी है कि केंद्र में भाजपा की सरकार उनके बूते पर बनी थी। संभवत: यही कारण है कि ज़मीनी कार्यकर्ता आज भी ज़मीन पर है और नेता हवा में उड़ रहे हैं।

        ऐसा लगता है कि भाजपा कार्यकर्ताओं को भी अब यह अहसास हो गया है कि नेता उनका इस्तेमाल कंडोम की तरह करते हैं। यही कारण है कि वे शिद्दत से काम नहीं करते हैं और इसी कारण 'शाइनिंग इंडिया' और 'लौह पुरुष प्रधानमंत्री' जैसे नारे उसे सत्ता नहीं दिला सके। इंदौर में संपन्न अधिवेशन एक ऐसा अवसर था, जिसमें नेतागण कार्यकर्ताओं का विश्वास जीत कर उनके बीच अपनी पैठ बना सकते थे, किंतु सुविधाभोगी नेताओं ने इस अवसर को जान बूझ कर गंवा दिया, जो भाजपा के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। भाजपा के बड़े नेता यह भूल गए हैं कि कार्यकर्ता ही पार्टी की रीढ़ होता है और ऐसे ही नेताओं के कारण पार्टी लगातार रसातल में जा रही है।

       अधिवेशन में भाजपा अध्यक्ष का सुर भी बदला हुआ था। गड़करी का अंबेडकर प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें मार्टिन लूथर किंग कहना इस बात का संकेत है कि भाजपा अब अगड़ों के साथ पिछड़ों को भी अपने पाले में करना चाहती है। सत्ता से बेदख़ल होने के बाद उसे यह अहसास हो गया है कि सिर्फ अगड़ों के बल पर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। इसी तरह अल्पसंख्यकों के प्रति भी पार्टी का नज़रिया बदला है। अध्यक्ष बनने के बाद गड़करी कई बार यह बयान दे चुके हैं कि अल्पसंख्यकों के लिए उनके दिल में बहुत जगह है। अगर अरुण जेटली, मुरली मनोहर जोशी या सुषमा स्वराज को अध्यक्ष बनाया जाता और वे अल्पसंख्यक राग अलापते तो जनता उस पर विश्वास नहीं करती, क्योंकि ये सब भगवा रंग में रंगे हुए हैं। इसीलिए गडकरी को आगे किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि संघ परिवार ने यह मान लिया है कि नफरत और तोड़फोड़ की सियासत पर सवार होकर दिल्ली की गद्दी तक नहीं पहुंचा जा सकता। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि भाजपा और संघ ने यह मान लिया है कि अल्पसंख्यकों को गाली देकर सत्ता नहीं हथियाई जा सकती। इसीलिए पार्टी का सुर बदल गया है, जो न सिर्फ भाजपा, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी शुभ संकेत है।

       आम जनता भाजपा में आए इस बदलाव को कितना स्वीकार कर पाती है, यह तो भविष्य ही बताएगा, किंतु मंदिर राग फिर अलापने से उसकी नीयत पर फिर संदेह उत्पन्न होता है। इससे लगता है कि भाजपा को अपने परंपरागत वोटों की भी चिंता है और वह उन्हें खोना नहीं चाहती है। ऐसे में दलित और अल्पसंख्यक उस पर भरोसा क्यों करेंगे ? बहरहाल इंदौर में संपन्न भाजपा अधिवेशन में हुए मंथन से पार्टी कोई अमृत कुंभ तलाश नहीं कर पाई। इसके विपरीत गडकरी, शिवराज सिंह चौहान और कैलाश विजयवर्गीय ने मंच पर फिल्मी गाने गाकर यह जता दिया कि वे कितने धीर-गंभीर है। जिस मंच से देश की ज्वलंत समस्याओं पर चिंतन-मनन होना था, वहां फिल्मी गीतों से भाजपा की असलियत ही उजागर हुई। यह भाजपा के भविष्य के लिए ठीक नहीं है।

महेश बाग़ी