संस्करण: 01 फरवरी-2010   

कंधामाल में ईसाई आज भी आतंक के साये में

एल.एस.हरदेनिया

पूरे दो वर्ष बीत जाने के बाद भी उड़ीसा के कंधमाल जिले में रहने वाले ईसाई आज भी आतंक के सायें में जी रहे हैं। आतंक इतना गंभीर है कि अनेक ईसाई परिवार, जो 2007 के दिसंबर माह में तथाकथित हिन्दू संगठनों की ज्यादतियों से परेशान होकर अपने गांव और घर छोड़कर चले गये थे, वे अभी भी वापिस नहीं आये हैं। यदि उनमें से कुछ वापिस आने का प्रयास भी करते हैं तो उन पर दबाब बनाया जाता है कि वे उनके द्वारा की गई शिकायतों को वापिस लें और यह आश्वासन दे कि भविष्य में भी वे कोई शिकायत नहीं करेगें।

 

अभी हाल में, मेरे उड़ीसा प्रवास के दौरान हिन्दू संगठनों के जुल्मों से पीड़ित अनेक भुक्तभोगियों ने ऐसी दर्दनाक कहानियां बताईं जिन्हें सुनकर रोंगटे खडे हो जाते हैं। यदि कोई पीड़ित अपना बयान दर्ज कराने अदालत आता है तो उसे अपनी बात कहने से रोका जाता है। न सिर्फ उसे बल्कि उसके सभी रिश्तेदारों को भी धमकाया जाता है। उन्हें चेतावनी दी जाती है कि यदि उन्होंने अपने रिश्तेदार को अदालत में बयान देने से नहीं रोका तो उसे इसके दुष्परिणाम भुगतना पडेग़ें। इस तरह की घटनाएं इतनी बढ़ गई हैं कि प्रभावित लोगों ने अब अदालत आना ही बंद कर दिया है। इसी तरह, इन भुक्तभोगियों ने उस जाँच आयोग के बहिष्कार की भी घोषणा कर दी है जो कंधमाल की घटनाओं की जाँच के लिये गठित किया गया है। इसी माह की 13 जनवरी को सांप्रदायिक हिंसा पीड़ित संगठन नामक संस्था ने जाँच आयोग के अध्यक्ष को सीधे एक पत्र लिखकर यह सूचित कर दिया है कि मजबूर होकर वे अब आयोग का बहिष्कार कर रहे हैं।

 

पत्र लिखने वालों ने उन कारणों को भी बताया है जो बहिष्कार के लिए जिम्मेदार हैं। पत्र में हस्ताक्षर करने वालों ने आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री सरत चन्द्र महापात्र की इस बात को लेकर आलोचना की है कि उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर यह घोषित कर ड़ाला कि कंधमाल में हुई हिंसा को सांप्रदायिक नहीं कहा जा सकता। आयोग के अध्यक्ष द्वारा बिना जानकारी हासिल किये, बिना तथ्यों को जाने, इस नतीजे पर पहुचना कि हिंसा, सांप्रदायिक नहीं है भुक्तभोगियों के साथ घोर अन्याय है। अपनी कार्यवाही शुरू करने के पहले ही दिन से आयोग ने मीड़िया को दिन भर की कार्यवाही से अवगत कराना प्रारंभ कर दिया, जो कि किसी भी दृष्टि से उचित नहीं था। आयोग ने धर्म परिवर्तन के संबंध में प्रश्न उठाना प्रारंभ कर दिया। उसने कहां कि धर्म परिवर्तन एक सामाजिक समस्या है जिसे हिंसा से जोड़ना न्यायोचित नहीं है और यह भी कि धर्म परिवर्तन का प्रश्न उठाने से और हिंसा भड़कने की संभावना है। जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों ने, जिनमें कंधमाल के पुलिस अधीक्षक प्रवीन कुमार, पूर्व पुलिस महानिदेशक गोपाल नंदा और मनमोहन प्रहाराज शामिल हैं, ने धर्म परितर्वन के मुद्दे पर असंवेदनशील बयान दिये। उन सबने धर्म परिवर्तन के मामले को ऐसे पेश किया मानों धर्म परिवर्तन अपराध है। इन अधिकारीयों ने यह नहीं बताया कि उनने स्वामी लक्ष्मणानंद की अंतिम यात्रा के जुलूस को क्यों नहीं रोका, जबकि अंतिम यात्रा के साथ चलने वाले लोग भड़काऊ नारे लगा रहे थे। जाँच के दौरान भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष सुरेश पुजारी की उपस्थिति का प्रतिकूल प्रभाव गवाहों और पीड़ितों पर पड़ता है। वे एक वकील के रूप में आयोग की कार्यवाही के दौरान उपस्थित रहते हैं। न सिर्फ यह, वे संवाददाता सम्मेलन के दौरान भी उपस्थित रहते है जो कतई उचित नहीं है। अभी कुछ दिन पहिले, विधायक अदिकंड़ा सेथी के द्वारा पूछे गये प्रश्न के उत्तर में स्वयं मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने विधानसभा को बताया था कि कंधमाल की हिंसा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं का हाथ था। आयोग को चाहिये था कि वह विधानसभा की कार्यवाही के रिकार्ड बुलाकर, आवश्यक कार्यवाही करता, जो कि नहीं की गयी। विधानसभा में दी गई सूचना के आधार पर आयोग को कार्यवाही करनी थी, जो नहीं की गई।

 

आयोग के अध्यक्ष को संबोधीत करते हुए कहा गया कि समय समय पर आपके द्वारा दिये गये बयानों में इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि पूरी जानकारी एकत्रित किये बिना, आपने हिंसा के कारणों की चर्चा सार्वजनिक रूप से की। इन तमाम बातों को दृष्टिगत रखते हुए हमारे सामने एक ही विकल्प शेष रह गया है और वह यह कि हम आयोग की कार्यवाही का बहिष्कार करें।

 

इसी संगठन ने उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को भी एक ज्ञापन दिया है जिसमें उसने जाँच अयोग की निष्पक्षता पर संदेह प्रगट किया है और उन्हें आयोग की कार्यवाही के बहिष्कार संबंधी अपने निर्णय से अवगत कराया है। ज्ञापन में स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा विधानसभा में दी गई जानकारी का उल्लेख है।

 

दिनांक 23-11-09 को कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंड़िया के विधायक की अदिकंड़ा ने विधानसभा में, एक प्रश्न के माध्यम से, मुख्यमंत्री से उन संगठनों का नाम जानना चाहा था, जिनका कंधमाल मे हुए दंगों में हाथ था। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि दंगों के संबंध में विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के कितने कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की गयी है।

प्रश्न का उत्तर देते हुए मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने बताया कि पुलिस स्टेशनों पर दर्ज की गई शिकायतों की जाँच के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कंधमाल में हुए दंगो में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल के कार्यकर्ता शामिल थे। इन संगठनों के कार्यकर्ताओं के दंगे में लिप्त होने के कारण उनकी गिरफ्तारी भी की गई। जो गिरफ्तार किए गए, उनमें 85 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 321 विश्व हिन्दू परिषद एवं 118 बजरंग दल के कार्यकर्ता शामिल थे।

मुख्यमंत्री से यह जानकारी भी मांगी गयी थी कि कंधमाल दंगों के दौरान कितने मकान, कहां जलाये गये और अभी कितने लोग जेल में हैं। उत्तर में बताया गया कि दंगों में 38 लोग मारे गए तथा 4640 मकानों को गंभीर क्षति पहुंचाई गई। स्पष्ट है कि दंगों के लिए संघ परिवार ही जिम्मेदार है।

 

कंधमाल के दंगा पीड़ितो के संगठनों की शिकायत है कि मुख्यमंत्री द्वारा इतने स्पष्ट शब्दों में संघ परिवार पर दोषारोपण के बावजूद प्रशासन व पुलिस उनके विरूध्द सख्त कार्यवाही करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। उनका यह भी आरोप है कि आज भी संघ परिवार के इशारे पर पुलिस कार्यवाही कर रही है। दंगा पीड़ितो के संगठनों ने मुख्यमंत्री को दिए गए ज्ञापन में इस बात का उल्लेख किया है कि कंधमाल में दंगो के आरोपी सीना तान कर घूम रहें है। संघ परिवार के आतंक के कारण 50 हजार ईसाईयों में से बहुसंख्यक अभी भी अपने गांवों में वापस आने का साहस नहीं जुटा पा रहे है।

 

मुख्यमंत्री के अलावा, उड़ीसा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी वास्तविक स्थिति से अवगत कराया गया है। मुख्य न्यायाधीश को दिए गए ज्ञापन में इस बात पर जोर दिया गया है कि कंधमाल हिंसा के पीड़ितों को शासन से न्याय नहीं मिल रहा है। साथ ही दोनों फास्ट ट्रेक अदालतों और जाँच आयोग से भी उन्हें कोई विशेष उम्मीद नहीं है।
 


एल.एस.हरदेनिया