संस्करण: 01 फरवरी-2010

सरकार का मुँह देखकर
ही काम करती है नौकरशाही
 

वीरेंद्र जैन

ध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी सरकार के पिछड़ेपन के बारे में हो रही आलोचनाओं से बौखला कर अपनी कमजोरियों का ठीकरा नौकरशाही के सिर फोड़ना शुरू कर दिया है। स्मरणीय है कि विकास को जाँचने के सबसे बुनियादी मानक जीडीपी सकल घरेलू उत्पाद, की गणना में मध्य प्रदेश देश के सबसे फिसड्डी राज्यों में गिना गया है तथा दूसरे फिसड्डी राज्यों बिहार, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, झारखण्ड छत्तीसगढ से भी पीछे रह गया है।

सीएसओ केन्द्रीय सांख्यकी संगठन, की रिपोर्ट बताती है कि 4.89: जीडीपी की दर से विकास करने वाला यह राज्य देश की जीडीपी की तुलना में आधा विकास ही कर सका है।यह तब है जब कि इस प्रदेश की सरकार सैकड़ों करोड़ रुपयों की मेहमानबाजी करके उद्योगपतियों के लिये पीले चावल बिछाये होने का प्रचार कराती रहती है। जमीनें लगभग मुफ्त में ही दी जा रही है व उद्योगपतियों को समझाया जा रहा है कि सारे श्रम कानून उन्हीं के पक्ष में तोड़े मरोड़े और बनाये बिगाड़े जायेंगे। स्मरणीय है कि गत दिनों अपनी यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने एक प्रेस् वार्ता में प्रदेश की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुये कहा था कि मध्य प्रदेश सरकार, केन्द्र सरकार से मिले धन को ही स्तेमाल नहीं कर पा रही है। उसके बाद बुलायी गयी पहली बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य शासन को प्राप्त होने वाली केन्द्रीय सहायता का पूरा उपयोग न करने वाले विभागों के अफसरों की अक्षमता का खामियाजा संबंधित क्षेत्र की जनता भुगतती है जिससे संबंधित क्षेत्र का विकास प्रभावित होता है। ऐसे सभी विभागों को चिन्हित कर इसी सप्ताह उनकी बैठक बुलायी जाना चाहिये।

दरअसल नौकरशाही अपनी सरकार के अनुसार ही काम करती है। यदि सरकार ईमानदार और कर्मठ होती है तो नौकरशाही बेईमान और नाकारा नहीं हो सकती। जिस मंत्रिमण्डल में आधा दर्जन से ज्यादा ऐसे सदस्य हों जिन के घर और परिवारियों पर आयकर विभाग ने छापा मारकर करोड़ों रुपयों की अघोषित सम्पत्ति जमीनों के कागजात, शेयर, बीमा पॉलिसियाँ, बैंकों की जमा रसीदें और लाकर जब्त किये हों उनके अफसरों से ईमानदार होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। जिस मंत्रिमण्डल में ऐसे ऐसे मंत्री हों जिनके ड्राइवरों के यहाँ तक से करोड़ों रुपये मिले हों उनके अधिकारियों द्वारा जो काम किया भी जायेगा तो वह कागजों से बाहर कैसे आ सकेगा। जिस मंत्रिमण्डल के सदस्यों की छोटी छोटी लड़कियाँ स्कूल में नोटों की गड्डीया ले जाती हों और सहपाठियों को बताती हों कि उनके यहाँ तो बोरों में नोट भरे रहते हैं ऐसे बोरे नियमानुसार काम करके तो नहीं भरते। अभी तक पुलिस थानों, ट्रैफिक चेक पोस्टों सेल्स टैक्स बैरियरों आदि की नीलामी की खबरें ही सुनते थे किंतु अब तो खुले आम कलेक्टरों की कुर्सियाँ भी नीलामी पर चढी हुयी हैं तब विकास की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

जिलों में सरकारी पार्टी के स्थानीय स्तर के नेताओं द्वारा मलाईदार विभागों के अफसरों से इतनी माँगें की जाती हैं कि उपलब्ध  बजट से कई गुना माँगें तो अधूरी ही रह जाती हैं ऐसे में सरकारी कामों की उम्मीद कैसे की जा सकती है। सच तो यह है कि जितने ईमानदार अफसर हैं वे अपनी लाज बचाने के लिये नाकारा होने का आरोप ग्रहण करने के लिये विवश हैं और जितने अफसर बेईमानी में सहभागी हैं उनका सारा काम कागजों पर ही रह जाता है जिससे जनता प्यासी की प्यासी रह जाती है। जो दुस्साहसी होते हैं उनका हाल प्रो. सब्बरवाल जैसा होना तय है क्योंकि अपराधियों को सरकार खुद ही बचाने में आगे रहती है तथा अपराधियों के छूट जाने पर जलूस में नाचता हुआ मंत्री बयान देता कि आज मुझे इतनी खुशी है जितनी कि मंत्री बनने पर भी नहीं हुयी थी। सही काम करने वाली एसडीएम संजना जैन को ट्रांसफर झेलना पड़ता है वहीं मंत्रियों के साथ हम्माम में स्नान करने वाले अफसरों की बल्ले बल्ले होती है। राजधानी में निरंतर जंजीरें खींचे जाने की घटनाओं में अगर कोई पकड़ा जाने वाला अपराधी सोना खरीदने वाले दुकानदार का पता उगलता है तो उससे पूछताछ करने से पहले ही सरकारी पार्टी के नेता दुकानदार पर दबाव न बनाने के लिये पुलिस पर दबाव बनाने लगते हैं, और खीझ में पुलिस अपराधियों को पकड़ना ही छोड़ देती है। सरकारी पार्टी के लोग सरे आम ट्रैफिक उल्लंघन करते हैं और उन्हें रोकने वाली महिला कांस्टेबिल को ही दँड भुगतना पड़ता है। काम का बहुत सारा हिस्सा अदालतों से स्टे मिलने कए कारण रुक जाता है और कार्यस्थलों के अतिक्रमण अनंत काल तक चलते रहते हैं क्योंकि अभियोजन प्रासीक्यूसन, तो सरकार के पास है और सब जगह वही होता है जैसा कि अदालत ने सब्बरवाल मामले में टिप्पणी करते हुये व्यक्त की है।

यदि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सचमुच ही गम्भीर हैं तो उन्हें सबसे पहले अपने प्रचारित आदर्शों को अपनी पार्टी पर ही लागू करने की हिम्मत दिखानी चाहिये। उसके बाद नौकरशाही द्वारा की जाने वाली कार्यवाहियाँ स्वत: ही लाइन पर आ जायेंगीं।

 
वीरेंद्र जैन