संस्करण: 01 फरवरी-2010

शिवराज का
एक और भ्रमजाल
 

महेश बाग़ी

   राजनीतिक वीथिकाओं में यह माना जाता है कि संघ और भाजपा से जुड़े लोग भ्रम फैलाने में माहिर होते हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस मान्यता पर मुहर लगा रहे हैं। मुख्यमंत्री इन दिनों 'आओ मध्यप्रदेश बनाएं' यात्रा पर हैं। उनका मानना है कि इससे विकास को गति मिलेगी और स्वर्णिम मध्यप्रदेश का सपना साकार होगा। सवाल यह है कि जब सरकार के पास विकास योजनाओं के लिए बजट ही नहीं है तो यात्रा करने से क्या हासिल होगा ? क्या इस यात्रा के ज़रिये शिवराज सिंह भ्रमजाल नहीं बुन रहे हैं ?

यही शिवराज सिंह चौहान जब योजना आयोग से राज्य की योजनाओं को मंजूरी दिलाने और विकास के लिए अधिक धन की मांग करते हैं, तब वे खुद यह भी बताते हैं कि राष्ट्रीय मानव विकास की दृष्टि से मध्यप्रदेश देश के 15 बड़े राज्यों में 12वें स्थान पर है। प्रदेश की 32.04 प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने के लिए अभिशप्त हैं। कुपोषण के मामले में भी प्रदेश की हालत ख़राब है। प्रदेश में प्रति हज़ार बच्चों में से 28 बच्चे एक वर्ष की आयु पूरी करने के पहले और 70 बच्चे तीन वर्ष की आयु पूरी करने के पहले काल के ग्रास बन जाते हैं। मृत्युदर का राष्ट्रीय औसत 7.4 है, जबकि प्रदेश में यह औसत 8.6 प्रति हज़ार है विधान सभा चुनाव के पूर्व भाजपा ने कुपोषण में कमी लाने का वादा किया था, जबकि वास्तविकता यह है कि प्रदेश के 44 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। पोषण आहार के लिए केंद्रीय मदद का नौकरशाही दुरुपयोग कर रही है और सरकार सब कुछ देखते हुए भी ख़ामोश है।

सरकारी खज़ाना ख़ाली होने के कारण विकास कार्य ठप्प हो गए हैं, जिससे निर्माण कार्यों में लगे मज़दूरी बेकार हो गए हैं। इन मज़दूरों के लिए मुख्यमंत्री ने पंचायत की नौटंकी तो कर डाली, किंतु उन्हें रोज़गार उपलब्ध करवा पाने में वे नाकाम रहे। यही वजह है कि प्रदेश के लोगों की आय लगातार कम होती जा रही है। आय की दृष्टि से राष्ट्रीय औसत 33,228 रुपए है, जबकि प्रदेश में यह औसत मात्र 18,051 रुपए ही रह गया है। शिक्षा मद में केंद्र से भारी भरकम राशि मिलने के बावजूद प्रदेश की 34 फीसदी आबादी निरक्षरता का दंश झेल रही है। वर्ष 2003 की तुलना में प्रदेश में ग़रीब बढ़े है। मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से 1994 में मध्यप्रदेश 11 वें स्थान पर था, जो अब 17वें स्थान पर पहुंच गया है। इससे स्पष्ट है कि सामाजिक क्षेत्र और जनकल्याण के मामले में शिवराज सरकार बुरी तरह विफल रही है।

मध्यप्रदेश बनाने की यात्रा पर निकलने से पहले यदि मुख्यमंत्री ने अपने गिरहबान में झांक लिया होता तो शायद वे यात्रा करने को नौटंकी नहीं करते। एक ओर वे केंद्र पर राज्य से भेदभाव करने के आरोप अक्सर लगाते रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्रीय मदद का उपयोग भी नहीं करवा पाते हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि किशोर बालिकाओं के उत्थान के लिए केंद्र द्वारा आवंटित बजट में से 447.68 लाख रुपए यह सरकार ख़र्च नहीं कर सकी। एक ओर सरकार को प्रदेश को झुग्गीमुक्त करने का संकल्प जताती है, वहीं दूसरी ओर इस मद में 115.21 लाख रुपए लैप्स हो गए। इसी तरह पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष में 22535.86 लाख रुपयों का सरकार उपयोग नहीं कर सकी। नेशनल ई गवर्नेंस एक्शन प्लान में 1189.20 लाख रुपए खाते में पड़े रह गए और सरकार विकास कार्य नहीं करवा सकी। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में 33997 लाख रुपए लैप्स हो गए। छोटे और मझोले शहरों में आधारभूत विकास योजना मद में 11492.29 लाख रुपयों का सरकार की निष्क्रियता के चलते कोई उपयोग नहीं हो सका।

विकास का दंभ भरने वाली शिवराज सरकार की असलियत यह है कि उसने नौ विभागों के लिए केंद्रीय मदद यह कह कर लौटा दी कि वह यह राशि खर्च करने में असमर्थ है। कृषि, ग्रामीण विकास, पंचायत, ऊर्जा, स्कूली शिक्षा, शहरी विकास, चिकित्सा शिक्षा, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी और अनुसूचित जनजाति कल्याण कार्यक्रमों के लिए आए अरबों रुपए सरकार ने केंद्र को लौटा दिए। प्रश्न यह है कि जो सरकार अपनी कागज़ी नौटंकियों पर सरकारी खज़ाना खाली कर चुकी है, वह केंद्रीय मद का भी सदुपयोग क्यों नहीं कर पा रही है ?

उपरोक्त सवाल का एक ही जवाब है-नाकारा नेतृत्व। मुख्यमंत्री सचिवालय में बैठे आला अफसरान शिवराज सिंह को नित नई नौटंकी में उलझा कर मनमाने ढंग से सरकार चला रहे हैं। उनकी सलाह पर वे कभी पांव-पांव वाले भैया तो कभी मामा बन जाते हैं। कभी सायकल पर सवार हो जाते हैं तो कभी न्याय यात्रा की नौटंकी करने लगते हैं। अब वे मध्यप्रदेश बनाओ यात्रा की नौटंकी में व्यस्त हैं। यदि ऐसी यात्राओं से ही विकास हो जाता तो देश के सारे मुख्यमंत्री भी यही करते। लेकिन वे मंत्रालय में बैठते हैं, और नौकरशाही पर नियंत्रण रख विकास कार्यों को अंजाम देते हैं, जबकि शिवराज सिंह को मंत्रालय में बैठने की फुर्सत ही नहीं है। इसी कारण मध्यप्रदेश हर मामले में पिछड़ता जा रहा है, जिसके लिए सिर्फ शिवराज सरकार जिम्मेदार है।

महेश बाग़ी